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शुक्रवार, 22 मई 2020

कुपवी की जनता के नाम खुला ख़त


नोट:- कृप्या लेख को पूरा पढ़े तभी अपनी प्रतिक्रिया और अपनी सोच प्रदर्शित करे।

कुपवी की समस्त जनता को प्रणाम🙏

हालही में कुपवी ब्लाक को पिछड़ा घोषित कर दिया गया है।और स्वाभाविक है आज के दोर में जब सभी लोग फॉरवर्ड होना चाहते है तो इस निर्णय की खिलाफत भी होनी ही थी। सरकार के निर्णय के साथ खड़े होने और उसका विरोध करने वाले हमेशा ही रहते  है और लोकतान्त्रिक देश/प्रदेश में होने भी चाहिए। लेकिन मेरे प्यारे, भोले-भाले और सीधे-साधे कुपवी वासियो क्यों अपने क्षेत्र के बारे में दृष्टिकोण दुसरो के कहने पर बना रहे हो?? क्या बाहर वाले लोग कुपवी और कुपवी की हालात को आपसे बेहतर जानते है?

पहले तो आप लोग ये जान ले की बैकवर्ड का दर्जा  दिया क्यों जाता है? बैकवर्ड शब्द सुनने में अच्छा नहीं लगता और  बस आप लोग इतनी ही बात पकड़ के बेठे है, और बदनामी होने का डर आपको सता रहा है।आपको ये समझना चाहिए की बैकवर्ड आपको पर्सनली घोषित नहीं किया गया है। अगर आपमें कोई काबिलियत है तो आप अपने आप को कभी भी कही भी साबित कर सकते है,फिर आप कहा से हो उस बात को कोई नहीं देखता।  दूसरा जो व्यक्ति आपको समझता हो, जानता हो, चाहता हो उस को आपसे मतलब होता है। आप कहाँ से हो उस से कोई मतलब नहीं रह जाता। और जो आपको जानता ही नहीं उस के विचारो से आपको कोई फर्क पड़ना भी नहीं चाहिए।

विदेशो में भारत को सपेरों का देश कहा और माना जाता था। लेकिन विदेशो में रह रहे भारतीयो ने इस बात को इग्नोर करते हुए वहाँ खुद को साबित किया और आज हर बड़े देश में भारतीयो का अपनी काबिलियत के दम पर एक अलग ही रुतबा है। वेसे ही आप भी कीजिये, अगर क्षेत्र से बाहर रह रहे हो तो।

हमारा क्षेत्र अभी फॉरवर्ड नहीं है। झूठी शान के सहारे आखिर क्यों जीना  सच्चाई को स्वीकार करना सीखे और खुद को इस हिसाब से ढाले। और सोचे की कैसे आप अपने क्षेत्र की बेहतरी के लिए अपना योगदान दे सकते है।

और मेरे प्यारे लोगो यकीन मानो जो लोग आपका मजाक उड़ा रहे है वह लोग भी बैकवर्ड ही है। लेकिन सिर्फ एक मापदण्ड, वह है आर्थिक सम्पन्नता पूरा करने के कारण उनकी आँखे अंधी हो गई है और घमण्ड में चूर हो कर उन्हें सच्चाई नहीं दिख रही है। उनके क्षेत्र भी इतने फॉरवर्ड नहीं है जिस से की वे आज हम लोगो पे ऊँगली उठा सके। लेकिन हमे इन सब बातो से दूर रहते हुए केवल अपने क्षेत्र की बेहतरी के बारे में सोचना है।

आप अपने आप से ये सवाल कीजिये:-

क्या कुपवी भौगोलिक दृष्टि से दुर्गम क्षेत्र नहीं है? क्या यहाँ के अधिकतर गाँव तक पहुचने में आज भी काफी दिक्कते लोगो को नहीं उठानी पड़ती?? 

क्या हमारे क्षेत्र के लोगो की प्रति व्यक्ति आय बहुत कम नहीं है? क्या हम लोग अभी आर्थिक रूप से खुद को फॉरवर्ड कह सकते है?? खुद को न देखे, आप सक्षम हो सकते है, लेकिन आपके आसपास के अधिकतर लोग क्या आर्थिक रूप से संपन्न है???

क्या आपके क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर आज सुदृढ़ है??

क्या आपकी 50 प्रतिशत या उस से ज्यादा पंचायते पहले ही बैकवर्ड में नहीं आती??

क्या आपके पास बेहतर बैंकिंग सुविधा है??

क्या आपका क्षेत्र इतना फॉरवर्ड है की आपके पास बेहतर स्वास्थ्य सुविधा, बेहतर बिजली, बेहतर पानी, बेहतर सिंचाई, बेहतर शिक्षा या अन्य कोई भी मापदण्ड है जिस से आप खुद को फॉरवर्ड मानो??

क्या आपको आज तक लोग फॉरवर्ड कहते थे?? यदि कहते भी थे तो क्या आप सच  में फॉरवर्ड थे??

आपका क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से दुर्गम है, आर्थिक रूप से लोग अभी बहुत जादा संपन्न नहीं है, इंफ्रास्ट्रक्चर सही नहीं है, 50 प्रतिशत से अधिक पंचायते पहले ही बैकवर्ड में थी, बेहतर सुविधाये नहीं है, बैंकिंग सुविधाये ठीक नहीं है, लोग पहले भी हमे बैकवर्ड ही मानते थे। अगर आपके जवाब भी यही आये तो किस बात की शर्म मान रहे हो ?? क्या सच्चाई को स्वीकार करते हुए, हमारा मकसद ये नहीं होना चाहिए की अगर इस प्रावधान से 1 प्रतिशत भी फायदा क्षेत्र को दिला सके तो दिलवाया जाये। 

पिछले 16 साल से में कुपवी से बाहर रह रहा हूँ। यकीन मानिये लोग कुपवी को बैकवर्ड ही मानते और समझते है। और मुझे इस बात से न कल फर्क पड़ा न आज, मेरा मकसद सिर्फ इतना है की अपनी दिनचर्या से कुछ समय निकाल के अपने क्षेत्र के बारे में कुछ सोचु और करू।कोई दूसरा भला कैसे तय कर सकता है की मुझे क्या सोचना है। इसलिए अपने आप को मानसिक रूप से इस प्रकार ढाल लीजिये और अपने जीवन में जो भी कर रहे हो उस के साथ साथ थोडा थोडा योगदान अपने क्षेत्र के लिए भी करते रहे। यकीन मानिए यदि हम सब ऐसा करते है तो एक दिन जरूर बदलाव दिखेगे। और तब आपको अपने आप को कुपवी का कहने पर शर्म नहीं गर्व महसूस होगा।

अफसोस की बात है लेकिन सच्चाई है, कुछ लोग तो हमारे ऐसे भी है जो खुद को कुपवी का कहने पर शर्म महसूस करते है। जब अपने आप पर आपको खुद ही नाज नहीं है तो दूसरा भला क्यों नाज करेगा। यदि आप इस से पार पाना चाहते है तो अपने जीवन में कुछ ऐसा कर दिखाए जिस से लोग आप पर नाज करे।

कुपवी 1995 में ही बैकवर्ड में आ जाना चाहिए था जब ट्राइबल क्षेत्रो को छोड़ के बाकि पिछड़े क्षेत्रो के लिए अलग प्रावधान किए गए थे।लेकिन इन बातो पर भी अब बात करके कोई फायदा नहीं।

लेकिन एक बात है की पिछले कुछ समय से क्षेत्र में काफी बदलाव और सुधार हुए है। उसके लिए पूर्व की सरकार का भी धन्यबाद बनता है और विधायक महोदय का भी। लेकिन ये सभी बदलाव नाकाफी है। अब बैकवर्ड घोषित करके राजनितिक लाभ लेना भी हर नेता और हर पार्टी चाहेगी। कांग्रेस भी यही करती, और भाजपा भी यही कर रही है। लेकिन  मेरे प्यारे कुपवी वासियो हमे न तो सत्ता के झांसों में आना है और न ही विपक्ष में प्रोपगैंडा में आना है। दोनों की बाते सुने और अपने विवेक से निर्णय ले।और ध्यान रहे आगामी चुनावो में  हमे बैकवर्ड घोषित होने के नाम पर वोट नहीं देने है। बल्कि इस से उबारने के लिए सरकार ने क्या प्रयास किये,उन्हें देख कर वोट देने है।

लिखना बहुत कुछ चाहता हु लेकिन लेख पहले ही बहुत लंबा हो चूका है। 

इसलिए अंत में आपसे यही विन्नति है कृप्या सच्चाई को स्वीकार करते हुए अपनी ऊर्जा को सही दिशा में इस्तेमाल कर अपने क्षेत्र को और क्षेत्र के लोगो को कैसे उन्नति के पथ पर आगे बढ़ाया जाये उस बारे में सोचे और प्रयास करे।

और आप सभी से विन्नति रहेगी की अपने सुझाव जरूर दे। लेकिन में किसी का जवाब नहीं दूँगा मेने अपनी सोच और विचार पहले ही इस लेख के माध्यम से रख दी है।
उचित लगे तो कृप्या इसे अधिक से अधिक लोगो तक पहुचाये।

यदि कुछ गलत लिख दिया हो तो अपना समझ के क्षमा करे।

धन्यबाद🙏
आपका अपना
लोकिन्दर सिंह चौहान

।।जय हिन्द।।

सच्ची घटनाओ से प्रेरित होकर लिखी गई कहानियां - कहानी नं.- 01

तुम भी अपना फायदा देखो और चुप रहो

एक बार किसी पंचायत में चुने हुए नुमाइंदों और पंचायत के कर्मचारियो ने मिलकर बहुत लूट मचा रखी थी। कुछ ही समय में वे लोग बड़े बड़े रसूखदार बन गए थे। और लोग भी इन लुटेरो की बेइमानी को उजागर करने की वजाए उल्टा उनकी खूब वाह वाही और प्रशंसा करते थे। 

पंचायत के कामो का पैसा अपनी मन मर्जी से इस्तेमाल करना आम बात हो गई थी । जिन कामो में अपना मुनाफा दिखता केवल उन्ही कामो को तवज्जो दी जाती थी। गरीब और जरूरतमन्द लोगो की बात और मांग को अक्सर नजरअंदाज किया जाता था।

पंचायत के लोगो में अंदर ही अंदर इनके लिए गुस्सा उबल रहा था। लेकिन कोई भी इसपर बात करके  रसुखदारो का बुरा नहीं बनना चाहता था। 

एक दिन पंचायत का एक गरीब व्यक्ति मकान की मरम्मत और पानी, बिजली इत्यादि की समस्याए लेकर आया। इस गरीब व्यक्ति के मकान के हाल ऐसे थे की मिटटी से बना 2 कमरो का मकान बारिश आते ही पानी से भर जाता था। घर में दरवाजे तक नहीं थे। बिजली पानी की तो खेर बात छोड़ दीजिये। और इन सब के बावजूद सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात ये थी की ये आदमी BPL सूचि से अब तक बाहर था। 

पंचायत के नुमाइंदों ने उस समय तो उसकी मांगों को लेकर हामी भर दी। लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भी उसकी मांगे पूरी नहीं हुई। न BPL सूचि में डाला गया, न किसी सरकारी योजना के तहत घर बनाने के लिए सहायता की गई और न ही बिजली पानी की सुविधा मिली।

उस व्यक्ति की ऐसी हालात देखकर कुछ लोगो ने ये निर्णय लिया कि अब उन्हें उस गरीब व्यक्ति की सहायता करनी होगी  और पंचायत के कार्य में हो रही गड़बडिओ के खिलाफ भी आवाज उठानी होगी।

सबसे पहले तो उन लोगो ने उस गरीब व्यक्ति को बिजली पानी के कनेक्शन अपने खर्चे पर मुहैया करवाये। उसके पश्चात उस व्यक्ति के मकान की मरम्मत करने के लिए भी कुछ रूपए इकट्ठे किये। 

लेकिन जेसे ही उन लोगो ने पंचायत की गड़बडिओ को उजागर करना शुरू किया। पंचायत के नुमाइंदे उन्हें बदनाम करने पर उतर आये। उन लोगो के बारे में गलत अफवाहे पंचायत में फैलाई गई। लेकिन ये लोग अपने इरादों पर अडिग रहे। और एक के बाद एक गड़बड़ी सामने लाते गए।

पंचायत के नुमाइंदों को जब कोई और रास्ता नजर नहीं आया तो उन्होंने इनकी तरफ समझोते का हाथ बढ़ाया और माफ़ी मांगने का ड्रामा किया और इसके साथ साथ कई तरह के प्रलोभन भी दिए गए। 

अंत में जब पंचायत के नुमाइंदों को सफलता हाथ नहीं लगी तो  एक मीटिंग इन लोगो के साथ रखी गई । जब किसी भी तरह बात बनती नहीं दिखी तो पंचायती नुमाइंदे बोखलाहट में कहने लगे की "तुम लोगो ने पंचायत का नाम बदनाम कर दिया है",  " तुम्हे क्या नाते रिश्ते का कोई लिहाज नहीं" , "तुम लोगो को ऐसे उलटे काम करके क्या मिलेगा" , " ये फालतू काम क्यों करते हो", "तुम्हे तो अपना फायदा देखना चाहिए और फायदा उठा के चुप रहना चाहिए"। ये सब कह के सभी पंचायती नुमाइंदे वहाँ से चले गए । और उनके जाने के बाद इन लोगो में एक जोर जोर से हँसने लगा। उसे हँसता देख बाकि सभी लोग भी हसने लग गए। 
शायद ये हंसी उस पंचायत में एक नए उदय की ख़ुशी और गूँज थी।

ये निर्णय तो आप स्वयं लीजिये की कौन सही था कौन गलत। लेकिन आज हर पंचायत में हालात लगभग कुछ ऐसे ही है और लोगो को भी बिल्कुल ऐसे ही एकजुट होकर गलत के खिलाफ बिना डरे और निस्वार्थ भाव से आवाज उठाने की जरुरत है। तभी ग्रामीण क्षेत्रो में हालात सुधर सकते है।


।।जय हिन्द।।